रविवार, 23 अगस्त 2015

.महंगी मुस्कान / लघुकथा

" मुस्कान का व्यापारी हूँ । मुस्कान ही बेचता हूँ । कई प्रकार की मुस्कान है मेरे पास । "
" ये क्या बात हुई भला ..!!! मुस्कान का भी कोई व्यापार होता है  ! "
" होता है बाबू , आजकल मुस्कान भी बिकती है  । .... मुस्कान बडी ही महंगी चीज़ होती है । "
" अच्छा !! दिखाओ तो भला ... कितने प्रकार की मुस्कान है तुम्हारे पास ..??? "
" पहले जेब से पैसा निकालो , तुम्हारा जेब ही तय करेगा कि तुम पर कौन सा मुस्कान सुट करेगा । "
पढा लिखा बेरोजगार  भला क्या जेब में हाथ डालता .... दिहाड़ी करने लायक भी ना रहा था वो ।
महंगे मुस्कान  पर फीकी सी मायूस नजर  डाल वह आगे बढ़ गया ।


कान्ता राॅय 

मै दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ

धूमिल होती भ्रांति सारी, गण-गणित मैं तोड़ रही हूँ
कलम डुबो कर नव दवात में, रूख समय का मोड़ रही हूँ
                          मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......
नई भोर की चादर फैली, जन-जीवन झकझोर रही हूँ
धधक रही संग्राम की ज्वाला, सागर सी हिल-होर रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......
टूटे हृदय के कण-कण सारे, चुन-चुन सारे जोड़ रही हूँ
उद्वेलित मन अब सम्भारी, विषय-जगत अब छोड़ रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .....
मृदंग- मृदंग सा है मन मेरा, हरकाती सी शोर रही हूँ
क्षितिज रखी है मैने अंगुली, प्रत्यक्षित हिलकोर रहीं हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .........
रोक सको दम गर है तुममें, प्रलय-प्रकाश जोड़ रहीं हूँ
आत्म स्वरों को रौंदने वालें नर - नारायण तोड़ रहीं हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ........
शक्ति प्रकृति ढोना होगा, मन मृगछाल ओढ रही हूँ
पग-पग रक्तबीज राजे है, अस्त्र अक्षर बल जोर रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .........
सिंहासन डोले मनु रक्षक का, ठीकर सारे फोड़ रही हूँ
कोंपलें नई फूट रही है, निर्माण सेतु जोड़ रही हूँ
                          मैं दुर्गेश्वरी मै बोल रही हूँ .......
कान्ता राॅय
भोपाल

दिल आज उदास है

.आईये पास कि दिल आज उदास है
आपकी आस में दिल आज उदास है
याद का भँवर उडा ले चला इस कदर
थाम लीजिए मुझे दिल आज उदास है
हाथ में आपकी हैं छुअन सी लगीं
घटा को देख फिर दिल आज उदास है
दिल का धडक जाना आपके नाम से
बदलियों को देख दिल आज उदास है
छतरी में सिमटना एक ठंडी शाम में
यादों में तनहा दिल आज उदास है
रूहानी तलाश रूह की जैसी प्यास
ढुंढना आस पास दिल आज उदास है
पूछना मुझसे नाम मेरे यार का
सिसकती दास्तान दिल आज उदास है
सपनों की मंडियाँ बिकते हुए सपने
देख कर तमाशा दिल आज उदास है
चाँदनी की चकमक चाँद का चमकना
खनकती चुड़ियाँ दिल आज उदास है
ख्वाहिश तुम्हें क्यों पर्दा नशी की
कर दे फना इश्क दिल आज उदास है
रिश्तों को तोलना बाजार क्या है
रौंदना इस कदर दिल आज उदास है
यादों की बूंदें गीला सा मन मेरा
नमकीन बरसात दिल आज उदास है
सूनी सी डगर गाँव के चौपाल में
चुप्पी हवाओं की दिल आज उदास है
इंतजार पल पल क्यों करें दिल मेरा
मुड़कर ना देखना दिल आज उदास है
सतरंगी सपना पलना युँ बार बार
ऐतबार क्युं कर दिल आज उदास है



कान्ता राॅय
भोपाल

मै कंदराओं में जीती हूँ

मै नही अब कहीं भी
मुझे अब ढुंढना नही
इस गहन कंदरा में
खुद को समेट लिया है
बंद कर लिया है
अब किसी आहट का
इंतजार नही मुझे
सब पता मैने
अपना बदल लिया है
जहाँ मै पहले रहा करती थी
वहां मेरी शक्ल लिये
कोई तो जरूर रहता है
मै तो अब कंदराओं में ही रहती हूँ
गहन अंधेरे तले
निःशब्द होकर
मुझे मत ढुंढना
मै अब नहीं हूँ कहीं भी
एक उम्मीद
जीती थी मेरे अंदर
कल शाम को
उसकी लाश जलाई है मैने
अकेली ही उस लाश को
ढोई  थी  देर तक
मेरे कंधो मे अब तक दर्द बाकी हैै
वो लाश बडी भारी थी
पोषित थी वो बडे ही जतन से
कंधों के दर्द के साथ
मै कंदराओं में आ गई रहने
कंदराओं में मेरे साथ
कुछ झिंगुर भी रहते है
मुझे उनका रहना
अच्छा लगता है
वो काटने से पहले अपनी
पहचान जो बताते है
वो झिंगुर अपने से लगते है
चींक सी उठ जाती हैै
हूक सी उठ जाती है
जब वो काटती है
थोड़ी ही देर में झिंगुर
अपनी सी हो जाती है
अच्छा है ये झिंगुर
इसे वेश बदलना नही आता
वो दोहरे चेहरे भी नही जीता है
मुझे झिंगुर का काटना
सुख देता है
वो कहकर जो काटता है
झिंगुर अच्छे होते है
बस सोने नहीं देते चैन से
अपनी तीखी आवाज से
सीने को भेदते रहते है
झिंगुर अच्छे होते है
कंदराये अच्छी होती है
बस लाश अच्छे नही होते
वो कंधों को बहुत दुखाते है
लाश बिलकुल भी अच्छे नही होते है
देखो मै लाशों से छुपने आई हूँ
मै मौत से घबरा जाती हूँ
इसलिए मै अब
कंदराओं में रहने आई हूँ
इसलिए मै अब कंदराओं मे जीती हूँ
कान्ता राॅय
भोपाल
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फँस गया हूँ फंद में

जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
काली गहरी मन कोठरियां
रेंग रही तन पर छिपकलियाँ
प्राण कहाँ स्पंद में ....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
जग की उलझन कैसा बंधन
चल रे मनवा कर गठबंधन
जोगी परमानंद में ....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
अभिमानी मन ये जग छूटा
दुनिया तजते भ्रम सब टूटा
चैन नहीं आनंद में .......
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
सौ पर्दों में चेहरा छुपाये
ज्ञान रोशनी कैसे पाये
फँसा मन मकरंद में .....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में


कान्ता राॅय
भोपाल