गुरुवार, 12 नवंबर 2015

हैरी पोर्टर की दुनिया ( कविता )


हैरी पोर्टर की दुनिया में
वो रहता मसगूल
नोमिता और सिंगचेन बनकर
ही होना है मशहूर
वो कहता है माँ से
मुझे चाहिए माॅसमेलो
चावल दाल भूल कर
बन गया राईस केक का फैलो
खीर हलवा पूरी
अब हुई पुरानी बात
करना हो तो करो चाऊमिन पिज़्ज़ा
रोल वोल की बात
माँ बन गई माॅम
पापा का तो काम तमाम
ऐश और पिकाचू लेकर
याद रहा बस पोकीमोन
स्पाइडर मैन का जादू
ऐसा सर चढकर बोला
सुपर मैन और आयरन मैन
से एवेंजेर तक
सबका बन गया चेला
कहाँ गये विवेकानन्द ,
नेताजी सुभाष चंद्र से हीरो
बन गये इनके आदर्श
अब फिल्मिया हीरो
घट रहा है घुट रहा है
मासूमियत बचपन का
स्वभाव में रह गया बस
हरकत विडियो गेम सी
भटक रही है मरूभूमि में
मृगतृष्णा सा बचपन
सच की जमीन सरक गई
लड़कपन जिये उम्र पचपन
                  कान्ता राॅय
                     भोपाल

.चेहरा/लघुकथा


आधी रात को रोज की ही तरह आज भी नशे में धुत वो गली की तरफ मुड़ा । पोस्ट लाईट के मध्यम उजाले में सहमी सी लड़की पर जैसे ही नजर पड़ी , वह ठिठका ।
लड़की शायद उजाले की चाह में पोस्ट लाईट के खंभे से लगभग चिपकी हुई सी थी ।
करीब जाकर कुछ पूछने ही वाला था कि उसने अंगुली से अपने दाहिने तरफ इशारा किया । उसकी नजर वहां घूमी ।
चार लडके घूर रहे थे उसे । उनमें से एक को वो जानता था । लडका झेंप गया नजरें मिलते ही । अब चारों जा चुके थे ।
लड़की अब उससे भी सशंकित हो उठी थी, लेकिन उसकी अधेड़ावस्था के कारण विश्वास ....या अविश्वास ..... शायद !
" तुम इतनी रात को यहाँ कैसे और क्यों ?"
" मै अनाथाश्रम से भाग आई हूँ । वो लोग मुझे आज रात के लिए कही भेजने वाले थे । " दबी जुबान से वो बडी़ मुश्किल से कह पाई ।
"क्या..... ! अब कहाँ जाओगी ? "
" नहीं मालूम ! "
" मेरे घर चलोगी ? "
".........!"
" अब आखिरी बार पुछता हूँ , मेरे घर चलोगी हमेशा के लिए ? "
" जी " ....मोतियों सी लड़ी गालों पर ढुलक आई । गहन कुप्प अंधेरे से घबराई हुई थी ।
उसने झट लड़की का हाथ कसकर थामा और तेज कदमों से लगभग उसे घसीटते हुए घर की तरफ बढ़ चला । नशा हिरण हो चुका था ।
कुंडी खडकाने की भी जरूरत नहीं पडीं थी । उसके आने भर की आहट से दरवाजा खुल चुका था । वो भौंचक्की सी खड़ी रही ।
" ये लो , सम्भालो इसे ! बेटी लेकर आया हूँ हमारे लिए । अब हम बाँझ नहीं कहलायेंगे । "

कान्ता राॅय


प्यार/लघुकथा


पति को आॅफिस के लिये विदा करके ,सुबह की भाग - दौड़ निपटा पढने को अखबार उठाया , कि डोर बेल बज उठी ।
"इस वक्त कौन हो सकता है !" सोचते हुए दरवाजा खोला। उसे मानों साँप सूँघ गया । पल भर के लिये जैसे पूरी धरती ही हिल गई थी । सामने प्रतीक खड़ा था ।
"यहाँ कैसे ?" खुद को संयत करते हुए बस इतने ही शब्द उसके काँपते हुए होठों पर आकर ठहरे थे ।
"बनारस से हैदराबाद तुमको ढूँढते हुए बामुश्किल पहुँचा हूँ ।" वह बेतरतीब सा हो रहा था । सजीला सा प्रतीक जैसे कहीं खो गया था ।
"आओ अंदर, बैठो ,मै पानी लाती हूँ ।"
"नहीं , मुझे पानी नहीं चाहिए, मै तुम्हें लेने आया हूँ , चलो मेरे साथ । "
"मै कहाँ , मै अब नहीं चल सकती हूँ कहीं भी ।"
"क्यों, तुम तो मुझसे प्यार करती हो ना !"
"प्यार ! शायद दोस्ती के लिहाज़ से करती हूँ ।"
"तुम्हारी शादी जबरदस्ती हुई है ।हमें अलग किया गया है । तुम सिर्फ मुझे प्यार करती हो ।"
"नहीं, तुम गलत सोच रहे हो प्रतीक । मै उस वक्त भी तुमसे अधिक अपने मम्मी - पापा से प्यार करती थी ,इसलिए तो उनके प्यार के आगे तुम्हारे प्यार का वजूद कमजोर पड़ गया । "
"लेकिन जिस इंसान से तुम्हारी शादी हुई उससे प्यार ......"
"बस, अब आगे कुछ ना कहना , वो मेरे पति है और मै सबसे अधिक उन्हीं से प्यार करती हूँ ।उनसे मेरा जन्मों का नाता है । "
"और मै, मै कहाँ हूँ ? "
"तुम दोस्त हो ,तुम परिकथाओं के राजकुमार रहे हो मेरे लिए, जो महज कथाओं तक ही सिमटे रहते है हकीकत से कहीं कोसों दूर ।"
"अच्छा , तो मै अब चलता हूँ । तुमसे एकबार मिलना था सो मिल लिया । " बाहर आकर जेब में हाथ डाल टिकट फाड़ कर वहीं फेंक बिना पलटे वो निकल गया और वह जाते हुए उसे अपलक , उसके ओझल होने तक ,युँ ही ,वहीं ठिठकी निहारती रही ।


कान्ता राॅय
भोपाल

जिंदगी का मोह /लघुकथा


अनरवत यंत्रणा सहते हुए एक दिन उनके चंगुल से छूट कर भाग आई । कई महीने पहले अपहरण हुआ था उसका ... स्कूल से घर आते वक्त ...।
घर का दरवाजा नहीं खोला गया उसके लिये ।
पिंजरे में से मिठ्ठू ने चहचहा कर जरूर अपनी खुशी जाहिर की थी उसे देख कर ।
बहुत देर तक दरवाजे की कुंडियाँ खडकाती रही ...घंटों रो रोकर पुकारती रही । सन्नाटा पसरा हुआ था घर के अंदर .....मानो मातम मना रहे थे उसकी मौत का ।
वह दोषी नहीं थी इन परिस्थितियों के लिए ...!!
आखिर लौटना ही था उसे उसी काई और दुर्गंध में फिर से , जहाँ से भाग कर आई थी अपनो के पास ।
लौटते वक्त खिड़की ने चरमरा कर अपनी चुप्पी तोडी थी । खिड़की की ओट में माँ की सिसकियां भी सुनी थी ठहर कर उसने ।
सिसकियां लेते हुए एक हिचकी उसके गले में भी अटकी थी । उस दिन से वो अटकी हुई हिचकी आज तक गले में फाँस बनकर चुभती रहती है ।
कितना पाषाण हृदय है इस समाज का ...उस दिन महसूस हो गया था । वो परित्यक्ता आज भी हर बार उम्मीद लेकर निहारती है अपने उस स्वप्न नगरी को ...जहाँ उसके अपने अब उसके बिना ही जिंदगी जीते है । विचित्र सी मनःस्थिति ... त्याग दी गई समाज से ... परिवार से वह ... फिर भी मोह है कि छूटता ही नहीं ।
कान्ता राॅय भोपाल

घर की बात /लघुकथा



" मै इसे जान से मार दूंगा , इस बच्चे को ये ना जनेगी ! " रणधीर सिंह नें उसका गला दोनों हाथों से दबाते हुए कहा । उसकी आँखें बाहर ही निकल आती अगर जेठानी ने तुरंत ना छुड़ाया होता ।
आधी रात घर में कोहराम मचा हुआ था । गर्भवती रमा जो हाथ भर लम्बा घूँघट काढ़े घुमती रहती थी , वो आज सिर उघारे चंडी रूप धरे बेहाल थी ।
" शादी करके लाया तो मेरी जिम्मेदारी क्यों नहीं उठाई ? क्यों मेरे छाती पर सौत बिठाई , वो गलत नहीं था ?" रमा के क्रोध की चिन्गारी दहक कर , शोलों की लपक सी हो, घर भर को जलाने को आतुर थी ।
" मै चाहे जो करूं , मै मर्द हूँ , तु पूछने वाली कौन होती है ?"
" मैने बाहर जाकर जात - धर्म नहीं बिगाड़ लाई हूँ ,ये तेरे घर का ही वारिस है ,पूछ तेरे चाचा से । "
रणधीर सिंह को जैसे साँप सूँघ गया । चाचा की ओर देख घृणा से जोर से थूक बाहर दरवाजे से निकल गया ।
" घर की बात घर में ही रहने दो । मिट्टी डालो बात पर , सब ठीक है । बच्चा तो घर का ही है ना ! अब रात गई बात गई "- आँगन में खटिया पर लेटे - लेटे मौन होकर देर तक सब तमाशा देख, दादा नें खाँसते हुए आखिरी में अपना फरमान सुना दिये ।
कान्ता राॅय
भोपाल