रविवार, 23 अगस्त 2015

फँस गया हूँ फंद में

जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
काली गहरी मन कोठरियां
रेंग रही तन पर छिपकलियाँ
प्राण कहाँ स्पंद में ....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
जग की उलझन कैसा बंधन
चल रे मनवा कर गठबंधन
जोगी परमानंद में ....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
अभिमानी मन ये जग छूटा
दुनिया तजते भ्रम सब टूटा
चैन नहीं आनंद में .......
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में
सौ पर्दों में चेहरा छुपाये
ज्ञान रोशनी कैसे पाये
फँसा मन मकरंद में .....
जीवन के इस द्वंद में
फँस गया हूँ फंद में


कान्ता राॅय
भोपाल

.शक -- एक कश्मकश / लघुकथा

तैयार होकर रीता आॅफिस के लिए निकलने ही वाली थी कि नील  कह उठे  कि आज  वो ही उसे आॅफिस छोड़ आयेंगें  ।
           उसे समझते देर ना लगी कि ,   आज फिर नील  पर  शक का  दौरा पड़ चुका  है  ।
         थे  तो वे  आधुनिक व्यक्तित्व के धनी ही । पत्नी का कामकाजी होना , उन की उदारता का परिचय था   ।  इसी  कारण वे  स्त्री विमर्श के प्रति   बेहद उदार मान  पूजे   जाते  थे  समाज  में ।
          
" मै चली जाऊँगी , आप  नाहक क्यों परेशान होते हो !   आपके  आॅफिस का भी तो यही वक्त है । " -  उसके आँखों में दुख से आँसू छलछला आये ।
           " क्यों  , तुम मुझे अपने आॅफिस के लोगों से दूर रखना  चाहती हो ..?   रात में विशाल का फोन आया था किसलिए ....? " --  नील   ने सहसा   चिल्लाकर कहा तो रीता की आँखों में  चिंगारी भर उठी  ।
         " तुम्हें शर्म आनी चाहिए , तुम मुझ पर फिर शक कर रहे हो ?   आज की  मीटिंग का  टाईम चेंज हुआ था  इसलिए फोन किया था बताने को  । "
            "चलो , आॅफिस पहुँचा दो मुझे । "-- बातों को तूल देने से अब  बचना चाहती थी वो  ।
          " नहीं , तुम चाहती हो कि मै दूर रहू तुम्हारे पुरूष मित्रों  से ...तो यही सही ,  रहने दो अब मै नहीं जाता तुम्हें पहुँचाने  । "
      " वो सहकर्मी है मेरे । "
  रीता का अब  दम घुटने लगा था । शक्की पति ... !  वो क्या करें ?
            नील  के बेइंतहा प्यार उसे आकंठ डुबो देता ,तो दूसरी ओर शक्की स्वभाव  उसके स्वाभिमान को अक्सर तार -तार कर जाता था।
            झगड़ा बढ़ने पर  वो तलाक़ के बारे में  भी सोचती  थी  ,  लेकिन पैर न उठते थे  कि बिछोह का गम  नील   सह नहीं पायेगें  .....  कहीं  कुछ हो गया उनको तो  ....!


कान्ता राॅय 

.अक्श /लघुकथा

रमेश चला गया ...बिना बताये युँ ही अचानक से । रागिनी  जिंदगी की तनहाईयों में  उसके साथ बीते पलों में उसे याद कर तलाशती रहती ।
याद है एक दिन कैसे रमेश पहली बार  उसके ब्युटी पार्लर में कुछ काॅस्मेटिक बेचने आया था ।
नही लेना  था कुछ भी , फिर भी कैसा सम्मोहन था उसमें कि जो ना चाहिए था वो सब भी खरीद लिया था उससे ।
उसका आना बढने लगा था और रागिनी का खुद को खोते जाना उसमें ।
प्यार परवान चढा ही था कि अचानक उसका आना बंद हो गया । वो दिवानी सी उसको ढुंढती फिरती यहाँ वहाँ ।
वो नहीं आया । कई महीने कई साल बीत गये ।
रागिनी अब लोगों में रमेश का चेहरा ढुंढने लगी थी ।
सोमेश को प्यार किया रमेश के रूप में क्योंकि उसके बाल बिलकुल रमेश की ही तरह थे घुंघराले से ।
राकेश के तीखे नक्श में भी रमेश की छाया थी , इसलिए राकेश से भी प्यार किया रागिनी ने जी भर के ।
मुकेश को पीछे से रमेश समझ कर ही आवाज दे बैठी थी एकदिन  ,  लेकिन वो भी एक  अक्श ही निकला था रमेश कहीं नही   ।
वो दिवानी सी झूमती रहती थी  कई रमेशों  के अक्श के साथ ।
कितने रमेश  आये और गये लेकिन रमेश था क्या सबमें निहित ?
सात वर्ष जवानी के बिता दिया ऐसे ही ।
आज अचानक  एक बडे उद्यमी के रूप में रमेश उसके सामने खड़ा था ।
वो कहता जा रहा था उसे अपनी जीत की कहानी और रागिनी तलाश रही थी एक और रमेश के अक्श को रमेश के ही  रूप में ।

कान्ता राॅय

.वो माँ विहीना / लघुकथा

बचपन में ही माँ का स्वर्गवास हो जाना और पिता का दुसरी शादी ना करने का निर्णय उस नन्हीं सी जान का  अपने  मामा के यहाँ पालन - पोषण का कारण बनी  ।
मामी के  सीने पर  मूंग दलने के समान  होने के बावजूद वो   पल - पल  बढती हुई ,उससे  पिंड छुडाने के आस अब जाकर पूरी  हो चुकी  थी  ।
शहर में पिता के पास पहुँचा दी गई ।
पिता को क्या मालूम बेटियाँ कैसे पाली जाती है  !
लेकिन बेटी को मालूम था कि बेटियाँ माँ ,बहन और बेटी कैसे बनती है इसलिए दिन सुहाने से हो चले थे पिता और पुत्री दोनों के ।
खुशियाँ दो दिन की  ही मेहमान ठहरी  ।  खुशियों के  पैरों में चक्कर होते है इसलिए वो टिक कर कहीं नहीं रहती है   ।
बिना माँ की जवान होती बेटी पर  अचानक रिश्तेदार से लेकर आस - पडोस वाले तक कोई बाप तो कोई माँ , भाई  की भूमिका के आड़ में  उस पर नजर रखने लगे ।
पिता को अपनी बेटी से अधिक दुसरे बेटी वालों के तजुर्बे पर अधिक भरोसा था ।
माँ की ममता तलाशती हुई उस माँ विहीना को सिर्फ शक , ताने और सौ प्रतिबंध मिले ।
वो मासूम आज भी पिता के अंगुलियों के सहारे उनके हथेलियों में .... संवेदनहीन   आँचलो के नीचे  माँ को तलाशती  फिरती चलती है  ।

कान्ता राॅय
भोपाल

.निरमलिया ( लघुकथा )

   
"मुझसे से शादी करना  चाहता  है रे तू ... ? " - सिर से जलावन का गठ्ठर उतारते हुए निरमलिया आज पूछ ही बैठी मोहना से ।
   
      "हाँ , तु मेरे  मन को पसंद है । जो कहेगी मै सब करूँगा तेरे लिए ....। " -- मैली सी धोती से पसीना पोंछते हुए झेंप कर मोहना का मुंह शर्म से लाल हो उठा था ।
    
      उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि निरमलिया सच में मान जायेगी ।
   
      "मुझे  तीन चीज़ तु दे सके जिंदगी भर के लिए   तो मै शादी करूंगी तुझसे । "
    "क्या ..क्या ...?"
    "गैस चुल्हा , मोबाइल और मुझे  एक फैसले का  हक  । "
    "ये सब क्या कह रही है रे निरमलिया ? "
    "देख रे मोहना , मुझे चुल्हे में स्वंय को नहीं झोंकना सुबह से शाम तक, इसलिए गैस चुल्हा चाहिए .... मुझे सबसे बात करने को मोबाइल चाहिए और मुझे बच्चे जनने की मशीन नहीं बनना.... इस वास्ते  मुझे  एक फैसले का हक   । "
    "बस इत्ती सी बात ..... देख मैने आज ही अरहर बेची है पच्चीस हजार की ... !
   
 कान्ता राॅय