गुरुवार, 12 नवंबर 2015

क्यों वो अकेली / लघुकथा


नाट्यशाला की गहमागहमी से ही समझ में आ रहा था कि आज मंजे हुए कलाकारों की खास प्रस्तुति होनी है ।
सुहासिनी जी की मुख्य भूमिका में आज उनकी टीम का ऐतिहासिक रंगमंच प्रस्तुतीकरण था ।
नियत समय पर पर्दा उठते ही सुहासिनी जी स्टेज पर बडी़ कुशलता से नृत्य की शुरुआत करी । अपने सहभागियों की प्रस्तुति के लिए नदारद देख , वो चिंतित थी ।
सामने विशाल दर्शक दीर्धा और वह अकेली । स्तब्ध सी अब नाटिका की कर्णधार बन मगन वो , एक साँस में ही समस्त पात्रों को अपने नृत्य में उतार देर तक नाचती रही। तालियों से नाट्यशाला गुँजा उठा ।
मिडिया कर्मियों द्वारा बखानी जाने पर मालूम हुआ कि उसके द्वारा एकल नृत्य नाटिका में नृत्य का कोई नया मिशाल आज कायम हुआ है ।
लेकिन सुहासिनी जी की निगाहें भीड़ में दूर तलक अपनों के चेहरों को तलाश रही थी ।
कान्ता राॅय
भोपाल

राम का नाम/लघुकथा


" सुना है बापू जी का पुनर्जन्म होने वाला है इस साल ।"
" क्या कह रहे हो ?"
" अरे हाँ , दुनिया के ज्योत्षियों ने ही गणना करके ये सामाचार जारी किये है "
" भाई फिर तो अपनी निकल पडी समझो ! "
" वो कैसे भला ? "
" वो तो राम राम ही भजते है , और हमारी राजनीति तो राम के नाम पर ही चलती है । "

कान्ता राॅय
भोपाल

सिटी आॅफ जाॅय/लघुकथा


हाथ में धुंघरू बजाते हुए बाढ़ की पानी में भी रिक्शे पर सवारी को ढोता हुआ बैचेन सा दौडता चला जा था गंतव्य की ओर , लेकिन आने वाले दिनों के लिए पेट की चिंता व्याकुल किये जा रही थी ।
कल बाग बाजार की सवारी लेकर जाते हुए उनकी बातों से मालूम हुआ कि रिक्शेवालों की वजह से शहर नोंगरा ( गंदा ) हो रहा है । मेयर शहर से रिक्शा हटाने पर विचार कर रहे है ।
भूख की हाँडी को यहाँ की माटी ने भात देने से शायद अब इंकार कर दिया ।
" आह रे , सिटी आॅफ जाॅय ! जाॅय , की बोरो लोक के ई दिबी ? " ( जाॅय क्या बडे लोगों को ही दोगी ? )
" क्या हुआ दादा ? कहाँ खोये हुए हो रिक्शे को खींचते हुए ? "
" की बोलेगा रे साहिब , सुने हैं , कोलकाता अब रिक्शे वालों को प्रश्रय नहीं देगी ?"
" एटा की पागलामी रे बाबा ! क्या सब सोच रहे है ? ये रिक्शा और ट्राम तो संस्कृति है कोलकाता का , ये कभी नहीं जायेगा , बुझले की ! "

कान्ता राॅय
भोपाल

जोड़ का तोड़ (लघुकथा )


पूरे पच्चीस हजार ! ठीक से गिनकर रूपये पर्स में रखे उसने ।
किटी पार्टी खत्म होते ही उमंग भरी तेज कदमों से पर्स को हाथों में भींच घर की तरफ निकल पड़ी ।
पच्चीस महीने में एक बार ये अवसर आता है । हर महीने घर- खर्च से बचा बचा कर ही यहाँ पैसे भरती रही है ।
" माँ ,आ गई तुम , क्या इस बार भी नहीं खुली तुम्हारी किटी ? "
" खुल गई , देख ! "
" अब तो मेरा कम्प्यूटर आ जायेगा ना ? "
" हाँ , अब उतावली ना हो ,आ जायेगा । "
" देखना माँ ,अबकी बार कम्प्यूटर साइंस में भी सबसे अधिक नम्बर होंगे मेरे ! " वसुधा के आँखों में नई उम्मीदों के सपने पलते देख मन विभोर हो उठा । ममता से भरी हुई वह वसुधा के समीप जा उसका माथा चुम लिया ।
" क्या हुआ किटी खुल गई तुम्हारी ? "
" जी ! "
" लाओ , मुझे दो , कुछ और शेयर खरीदने के काम आयेंगे । "
" लेकिन , ये पैसे तो वसुधा के कम्प्यूटर के लिए जोड़े है बडी़ मुश्किल से किटी के बहाने । "
" वसुधा के लिये कम्प्यूटर ! उसको तो पराये घर जाना है , उसके लिए ये फालतू के खर्च .... ! "
कान्ता राॅय
भोपाल

अवलम्ब (लघुकथा)


" अभी जो बाहर निकल कर गई वो अनुराधा ही थी ना ? " उसको बडा अटपटा सा लगा उसे यहाँ देख कर तो अंदर आते ही एकदम से पूछ बैठी ।
" हूँ "
" हूँ , मतलब क्या दिव्या ! वह तेरे पति की गर्ल फ्रेंड है और तुमने उसे अपने घर आने दिया ! "
" अच्छा है ना , पति की गर्ल फ्रेंड अब मेरी भी गर्ल फ्रेंड ! पति अब उससे छुपकर नहीं मिलता है और यहाँ मेरा भी .....। "
" मै समझी नहीं , मतलब , मेरा भी क्या ? "
" पति उसके संग मुझे भी ..... , समझती क्यों नहीं , बिना अवलम्बन के उनके बिना तलाक लेकर कहाँ - कहाँ भटकती इस व्यस्क उम्र में , तो यहीं सही । "

कान्ता राॅय
भोपाल