बुधवार, 11 मई 2016

तमाशबीन / लघुकथा


वह अपने सीधेपन से असंतुष्ट होकर , करवट बदल , नया चेहरा अख्तियार कर रहा है । जब नाॅर्मल आदमी था तब वह भीड़ का हिस्सा हुआ करता था , लेकिन अब भीड़ का हिस्सा नहीं है ।

चरित्र में उग आये टेढ़ेपन की वजह से भीड़ में अलग , अपनी तरह का वह अकेला व्यक्ति है ।
पिछले कई दिनों से वह कूड़े - करकट का एक पहाड़ खड़ा करने में लगा हुआ था जो आज पूरा हो गया ।
उसके मुताबिक पहाड़ बहुत ऊँचा बना था । हाथ में एक झंडा लेकर उस पर चढ़ गया ।

कुछ लोग उसकी तरफ ताकने लगे। उसे देख कर लोगों के चेहरे पर सवालिया निशान उभरने लगे । धीरे -धीरे लोग सवाल बन गये ।
शलाका पुरूष .... मिथक पुरूष, ढोंगी इत्यादि अलग - अलग तरह के नामों से सम्बोधित कर , कुछ -कुछ कह , सवाल बने लोग अब अपने - अपने भीतर की तमाम गन्दगी उलीच रहे थे ।


कान्ता राॅय
भोपाल


पोकीमोन मास्टर / लघुकथा


नौ वर्ष का हनी अचानक से गायब था । सुबह से ही वह किसी को नजर नही आया था ।
गली मुहल्ला सब छान मारा , घर का लाडला , घर से गायब , कोहराम सा मच गया । जाने कैसे कहाँ ?? सभी थक गए ढुँढ कर उसको ।
अब तो रात के नौ बजने वाले थे । सबका दिल बैठा जा रहा था ।
पापा और चाचा दोनों पुलिस स्टेशन जाने के लिए गाड़ी उसी तरफ मोड़ दिए । जैसे ही गुलाब उद्यान के पास पहूचे तो वहीँ बाहर हनी को हताश , मुंह लटकाए हुए बैठे पाया ।
गाड़ी रोक बाहर निकल एकदम से पापा ने हनी को गले से लगाया , " बेटा तुम यहाँ कैसे आये ? "
" पापा मै तो जंगल में पोकीमोन ढुंढने आया हूँ , लेकिन मुझे तो एक भी पोकीमोन नही मिला , क्या मै अब कभी पोकीमोन मास्टर नही बन पाऊँगा ? " कहते हुए हनी रो पड़ा .

कान्ता राॅय
भोपाल


बुधवार, 13 अप्रैल 2016

आदमी और थाली / लघुकथा


" गरीब आदमी अौर कुत्ता दोनों की हैसियत बराबर होती है । नामुराद , दुत्कार में जीने वाले " यूनिवर्सिटी से बाहर निकलते हुए सड़क के कोने पर भिखारी की तरफ देख उसका मुँह कसैला हो गया ।
" गरीब आदमी और कुत्ता , ये कैसी बराबरी हुई भला ! क्या बेहूदगी है ? " उसने अपनी कमीज़ को नीचे खींच , पेंट की जेब को ढकते हुए कहा ।
" देखते नहीं , कैसे खा रहे है जमीन पर , दोनों को सिर्फ अपना पेट भरने तक ही मतलब होता है , आक थू ! "
" आह ! क्या कह रहे हो ? अपने पेट तक तो , हम सब भी आज सिमट गये है , क्या राजा क्या रंक ! "
" मतलब , तुम कहना क्या चाहते हो ? " वह बिदक उठा ।
" मतलब यही कि मै तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ , आदमी चाहे गरीब हो , रहता वो आदमी ही है " उसकी नज़र खाना खाते हुए उस भिखारी के चेहरे पर जाकर अटक गई , मानों वह उसके चेहरे में किसी को ढूँढने की कोशिश कर रहा था ।
" चलो ,अब तुम साबित करो कि उस भिखारी में और कुत्ते में अंतर है ! " गरीबी से बेखबर अमीरी तमतमा कर रोष में आ गयी ।
" बहुत आसान है साबित करना " कहते हुए अपने जेब में ठूँसी हुई पिता के कर्ज़ को टटोल , सिहर उठा ।
" तो देर किस बात की , चलो साबित करके दिखाओ ! "
" वो खाने की थाली देख रहे हो "
" हाँ ,देख रहा हूँ ,सो ! "
" सिर्फ उस थाली ने भिखारी और कुत्ते में फर्क को कायम रखा हुआ है । "

कान्ता राॅय
भोपाल


जरा थम के चलना / गीत


रुक - रुक , ऐ दिल ,जरा थम के चलना
लम्बा सफर है, दूर है मंजिल, थम-थम के चलना
रुक - रुक ,ऐ दिल ,जरा थम के चलना -------
आयेंगी कई-कई बाधाएँ ,डर कर मत रहना
नदिया की धारा बनकर ,कलकल तुम बहना ,
रुक-रुक , ऐ दिल ,जरा थम के चलना -------
पग -पग , काँटों का चुभना , खून-खून तर लेना
आँख-मिचौनी ,हौसलों से , खेल सुख -दुख कर लेना
रुक-रुक ,ऐ दिल ,जरा थम के चलना -------
पीतल में सोने सी आभा,चमक-चमक ,छल का छलना
हाथ की रेखा ,कर्म सत्य है,प्यार के पथ पर ही चलना
रुक - रुक ,ऐ दिल ,जरा थम के चलना -------
पत्थर की बस्ती , पत्थर के दिल ,तुम पथरीली ना बनना
रात अंधेरी , बड़ी भयावनी , चाँद -चाँदनी बन खिलना
रुक- रुक ,ऐ दिल , जरा थम के चलना--------

कान्ता राॅय
भोपाल


गुमान का हश्र / लघुकथा


समभाव ,सम प्रकृति वाले दो खेतों के बीच अचानक एक मेड़ बना दिया गया । यह बदलते मौसम का असर था ।
मेड़ ऊँची , बहुत ऊँची होती जा रही थी । तरह - तरह की बातों की झाड़ियाँ उगने लगी खेत की छाती में । हवा भी गर्म हो चली थी ।
फसल का चोला डाल , कुछ गैर-प्राकृतिक तत्व खरपतवार की तरह चारों ओर बढ़ने लगे । खरपतवारों को अब अपने दिन फिरने पर गुमान हो रहा था । सुना तो था कि घूरे के भी दिन फिरते है मगर ऐसे फिरते है अब तक जाना नहीं था । वे इतराकर दिन-प्रतिदिन दुगुनी रफ्तार से बढ़ने लगे ।
बुवाई का समय नजदीक आने पर खेत मालिक खेत पर गया। उसने खरपतवार के मारे खेत का हाल-बेहाल देखा ,तो सहम गया ।
उसे अपने पिता की कही हुई बात याद आई कि “ कुत्ते का काटना और चाटना, दोनों ही अच्छाई के लिए हानिकारक है, ठीक वैसे ही ओछे व्यक्तियों से मित्रता और दुश्मनी । “
जरा भी देर ना करते हुए , खेत के मालिक नें खरपतवार की असलियत पहचान , उनमें आग लगवा दी । अब वे सब धू –धू कर जल रहे थे ।


कान्ता रॉय
भोपाल