गुरुवार, 12 नवंबर 2015

मेरे मोहम्मद और मेरे नारायण/लघुकथा

अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी की तरह उसने लगभग गुर्राते हुए पुछा ,
 "आप ईदगाह में इन नमाज़ियों के बीच क्या कर रहे है "
" मैं यहां नमाज़ अदा फरमाने आया हूँ "
"क्यों , आप तो हिन्दू हो··· !"
"जी , मैं हिन्दू तो हूँ लेकिन मुझे एक बीमारी है। "
"बीमारी है तो डॉक्टर के पास जाओ , यहां क्या कर रहे हो ?"
" मेरी बीमारी का इलाज़ मेरे मोहम्मद और मेरे नारायण के पास ही है। "
"मेरे मोहम्मद और मेरे नारायण ········? चलो अब पहेलियाँ न बुझाओ , विस्तार से बताओ जरा "
" मैं जब पूजा करता हूँ तो मोहम्मद दिखाई देते है और नमाज़ पढता हूँ तो नारायण दिखाई देते है , इसलिए मैंने रमजान में मोहम्मद में वास करते नारायण के लिए रोज़े रखे है तो आज मैं उनका ही नमाज़ी हूँ। "


कान्ता रॉय
भोपाल

आस/कविता


स्नेह के आँचल तले
एक बीज बोया था
आस की अभिलाष पाले
एक भूल बोयी थी
नींद से जागते ही
उम्मीदों के जल से
रोज सींचा करती थी
रोज आँखों से
नापती थी उसको
टक टकी लगा कर
रोज सोचा करती थी
आने वाला कल हरा होगा
आँचल मेरा भरा होगा
उम्मीदों की क्यारियाँ सजेंगी
जीवन कलियाँ ,पँखुडियाँ होंगी
मौसम ने ली अँगड़ाई
आस अभिलाष की हुई लड़ाई
खूब गरजी खूब बरसी
बाग बगीचे कर गई मिट्टी
हो गये सब गिट्टी गिट्टी
नमक डाल कर बोझल कर गयी
सपने सारे ओझल कर गयी
आस हो गई जल थल ,जल थल
टीस रह गई पल पल ,पल पल
ढूंढ रही हूँ दोमट मिट्टी
काली कादो कीचड़ मिट्टी
फिर रही हूँ आँचल आँचल
बीज की अभिलाष लिये
एक नई फिर आस लिये ॥
कान्ता राॅय
भोपाल

आखिरी स्टेशन का मुसाफिर/कविता

जिंदगी रेल सी
दौडती हुई
भागती हुई
स्टेशन दर स्टेशन
सरक कर रूकती हुई
चढते मुसाफिर
उतरते मुसाफिर
रेलम की पेल में
यादों का कारवां
सीट के नीचे दबकर
रह जाता है
ट्रेन में बैठा
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर
सब देखता हुआ
कुछ सोचता हुआ
बैठा रहता है अकेले
साथ बैठ कर
मुँगफली खाते हुए
चाय के सकोरे के संग
बनाए हुए कुछ रिश्ते ,
कुछ संवाद और समस्त संवेदनाओं को
अपने बैग में कस कर
कंधे पर डाल
बीच स्टेशन का मुसाफिर
उतर जाता है
ले जाता है डब्बे की
कुछ दास्तान अपने संग
बदले में सीट के नीचे
बहुत कुछ अपना छोड़ जाता है
देखता रहता है
सोचता रहता है
बैठा रहता है अकेले
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर
आखिरी स्टेशन आने से पहले
एक सन्नाटा सा
ट्रेन की बोगी में
भर जाता है
यादों के काफिले के संग
गाड़ी सरक कर
आखिरी स्टेशन पर
पहुँच जाती है
प्रतीक्षा करते हुए
बेसब्री से
अपने लोगों को
देखते ही वह ट्रेन के
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर
रम जाता है
चहकते हुए महकते हुए
अपने लोगों में स्वंय को
दुरूस्त पाता है
गंतव्य पर आते ही
मुसाफ़िरों की यादों को वह भी
उसी सीट के नीचे छोड़ आता है
उन यादों को वह भी
उसी सीट के नीचे छोड़ आता है
कान्ता राॅय

विपरीत समय काल /कविता

शोर उठा
रावण जल रहा है
आँखें फाड़ -फाड़
चारों ओर देखा
क्यों बार - बार
राम ही जलते हुए
दिखाई दिये
रावण नहीं वहाँ तो
राम जल रहे थे
बुराई हँस रही थी
सच्चाई जल रही थी
सत्य का हानि
बुराई की विजय
विपरीत समय काल
स्वंय पर अविश्वास
अडिग रहें हर हाल
भले राम जले
भले रावण करें अट्टहास
हम रहें बस
स्वंय को संभाले
हम ना जले
राम की तरह
बचना होगा
रावण के हर प्रहार से
धर्म विजय मुश्किल है
अधर्म पताका झिलमिली है
संताप का कर्ज़ चुकायें
झिलमिली से बच बचायें
भले राम जले
भले रावण करें अट्टहास
हम रहें बस
स्वंय को संभाले ।
कान्ता राॅय
भोपाल

कैश बाॅक्स के नजारे/कविता

साफ़ नीला आसमान
सफेद रूई सा हल्का
बिलकुल हल्का ,
हल्का वाला सफेद बादल
कभी बहुत भारी सा हो जाता है
वक्त रेशम सी ,
रेशम सी मुलायम वक्त
फिसलती हुई ,सरकती हुई
रेशमी सा एहसास देती हुई गुजर जाती है
वक्त के वजूद में
जाने क्यों पहिए होते है
जो दिखाई नहीं देते पर ब्रेक नहीं होते है
शायद ब्रेक भी रहें हो कभी लेकिन
आजकल वक्त नहीं रूकता
यहाँ बाजार में बहुत भीड़ है
यह भीड़ कभी खत्म नहीं होती
यहाँ वक्त का कोई आस्तित्व नहीं है
रूई के फाये सी हल्की बादलों को
कोई नहीं देखना चाहता
वक्त नहीं है बाजार में किसी को आसमान देखने की
और चाहत नहीं है
उनको चाहत की क्या जरूरत
नीला आसमान तो
उनके दायरे में ही सिमटा हुआ जो होता है
वो सिर्फ कैश बाॅक्स की तरफ देखते है
नीला आसमान नहीं देखते
रूई के फाये सी हल्की बादलों को नहीं देखते
सिर्फ कैश बाक्स की तरफ देखते है
कैश बाॅक्स में उन्होंने
नीले आसमान को बंद करके रखा है
जब मर्ज़ी निकाल लेते है
जब मर्ज़ी देख लेते है ।
क्या जरूरत उन्हें बसंत की
क्या जरूरत उन्हें सावन और सुगंध की
ठहर कर क्यों देखे भला
वो तो सारे मौसमों को
अपने कैश बाॅक्स में बंद रखते है
जब फुरसत मिलती है काम से
जब मन करता है आराम से
कैश बाॅक्स में से सारे नजारे निकाल लेते है
और जी लेते है जब तब अपने मौसम को