गुरुवार, 10 मार्च 2016

विवेकानंद ( लघुकथा )


हाँ , आज ही के दिन उसका भी जन्म हुआ था , सिद्धांतवादी माँ धन्य हुई। इसलिए नाम रख दिया विवेकानंद।

समय बीता । विवेकानंद बड़ा हुआ । साथ ही बड़ा हुआ माँ के आँखों का सपना । 
उसका तेजस्वी पुत्र एक दिन देश ,धर्म और जन कल्याण में अपने जीवन की आहुति देगा।

उच्च डिग्री हासिल करने , विवेकानंद कॉलेज के हॉस्टल में रहता था ।
मोहल्ले भर का चहेता , यहां भी खूब नाम कमाए ।

आज छात्रवास में जश्न का माहौल ,आखिर क्यों न हो , चहेते के जन्मदिन का अवसर जो था । माँ का सिद्धांत ,समर्पण ,सपना अब युवा विवेकानंद के हाथों , विहस्की के बोतल में साकार हो रहा था ।

कान्ता रॉय
भोपाल

टॉमी ( लघुकथा )


"वाह शरद जी, आप तो पहुँचे हुए तीरअंदाज़ निकले! मान गये उस्ताद!"

"मतलब? क्या उस्तादी की मैने? "

"अरे वही, अपनी कार्यकर्ता कुसुमा देवी जी वाली केस में जो तटस्थता दिखाई है आपने, ना सही का साथ दिया, ना ही गलत का! यानि आपके तो अब दोनों हाथ में लड्डू है।"

"यह सब फालतू के चर्चे है, छोडिए कोई दूसरी बात कीजिएI"

"फालतू का चर्चा कहाँ, आप तो छा गये है! सुना है कि, विरोधी पार्टी की वह कार्यकर्ता भी अब आपके गुण गा रही है।"

"अब चुप भी रहिये मियाँ, यह राजनीति का रंग है, टिके रहने के लिए वक्त के हिसाब से बदलते रहने की यहाँ जरूरत होती है।"

"लेकिन, इन सबमें आपकी अपनी कार्यकर्ता कुसुमा देवी का क्या? वह तो आप पर भरोसा करती है। आपकी इस तटस्थता से, क्या उन पर असर नहीं पडेगा? "

"अरे वो? ऊँह, कोई असर नहीं.... वहाँ देखिए, दरवाजे पर बँधा मेरा टॉमी, दूध-रोटी और जरा सी पुचकार ....,
बस यही खुराक अपनी कुसुमा देवी का भी हैI"


कान्ता रॉय
भोपाल

तलाश एक ख़ास खबर की ( लघुकथा )


" इस तरह की खामोशी से न्यूज़ रूम का तो बेड़ा गर्क हो जायेगा ।
कुछ अलग हट कर ब्रेकिंग न्यूज़ ढूंढने की कोशिश करो । कुछ ऐसा कि लोग चौंक उठे "

" आप कहें तो , सर , वो दिन दहाड़े ए. टी.म. लूट की खबर को प्रसारित करवा दूँ ? "

"वो भी भला कोई न्यूज़ है ! जाओ कुछ और ढूंढो "

" सर ,आतंकवाद पर काम शुरू करू , आई मीन ,जेहादी ? "

" नो ! "

" प्रधानमंत्री जी की विदेश दौरा को अगर कवर करे तो ?"

" ये अब रेग्युलर सा सामाचार लगता है , उसमें धमाकेदार वाली बात कहाँ ! "

" सही कह रहे है आप , घोटालों में मंत्रियों के उजागर होने की , आप कहें तो काम करते है इस पर ।"

" अरे यार , समझते क्यों नहीं , आजकल जनता आदी हो चुकी है इन घोटालों को सुन -सुनकर , कोई तेज झन्नाटेदार खबर तैयार करो । "

" सर , एक और निर्भया जैसी बलात्कार वाले केस को हाई लाइट करें ? "

" नहीं ,ये भी नहीं "

" पिता का बेटी वाला रेप कांड "

" नहीं , अब यह भी बेअसर है । ढूंढो कुछ हट के "

" सर , मानव तस्करी ? "

" नो ! "

" बच्चों के माँस को पकाकर खाने वाली घटना ? "

" नहीं , उसपर भी बहुत हो चुका है ,याद है ना निठारी काँड ! बाद में जनता ने उसे घास भी नहीं डाला था , उसमें अब ब्रेकिंग न्यूज़ वाली बात नहीं रह गई है "

" सर , एक न्यूज़ है अछूता ,अगर आप कहें तो , लेकिन क्या ये सही होगा ? "

"सही- गलत तुम नहीं , बल्कि मैं सोचूंगा , बताओ ,जल्दी से कौन सा विषय है अछूता सा ? "

" सर , माँ - बेटे के रिश्ते में किस्सा ढूंढे तो ? "

"तेरा दिमाग सच में बहुत चलता है चिरकुट । इस बार प्रमोशन पक्का है , समझे ! "


कान्ता रॉय
भोपाल

भिखमंगा कहीं का ! (लघुकथा )


किसानी करने वाला धनीराम , सूखे की मार खा , परेशान हो ,अपनी मैली -फटी धोती और कई जगह से सिलाई उघड़े कुर्ते में ही , दो जून रोटी के इंतजाम के लिए , आज अपने गाँव से लगे , शहर में आ गया । राजधानी होने के कारण धनाढ्य वर्गों की बहुलता थी , इसलिए यहां मजदूरी के जरिये , कुछ कमाई होने की उसे आस थी ।

दोपहर तक कोई काम न मिलने की परिस्थिति में , अपना हाथ खाली देख , आँखों में बूढ़ी माँ , भूख से बिलबिलाते बच्चे और पत्नी के चेहरे की मायूसी याद आने लगी कि वह तड़प उठा। आँखे गीली हो गयी।
उससे ना रहा गया और वहीं चौराहे पर ही , लोगों के सामने हाथ पसारने लगा ।
" बहुत मजबूर हूँ बाबू, सूखे ने किसानी में बहुत मार दी है अबकी ,कुछ मदद कीजिये ,आपको पुन्न मिलेगा । "

"भिखमंगा कहीं का ! "आते -जाते लोग उसको हिकारत से देखते , भीख के बदले सिर्फ "भिखमंगे " का तमगा देते और आगे बढ़ जाते।

तभी वहाँ पर एक मारुति रुकी। बैनर लेकर कुछ सूट -बूट धारी , गाड़ी से बाहर निकल कर , वहाँ फ़ैल गए। बैनर पर धनीराम के गाँव का नाम सहित सुखाग्रस्त किसानो की मदद के लिए फंड जमा करने का उद्देश्य लिखा हुआ था।
देख कर उसके चहरे पर चमक फ़ैल गयी।

" ये मेरा गाँव है , मैं यहाँ का किसान हूँ , मैं यहाँ का किसान हूँ " जैसे ही वह चिल्लाया कि तुरंत दो सूटधारी उसे घसीट कर , दूर ले जाकर पटक दिया ," साले ! हमारा काम बिगाड़ने आया है , चुप रह , नहीं तो अभी ठिकाने से लग जाएगा ! "

बैनर के सामने रखा बड़ा सा कनस्तर , थोड़ी ही देर में , फंड के फंडे से तृप्त होकर , दूर बैठे धनीराम के फटे हुए कुर्ते को मुंह चिढ़ा रहा था ।


कान्ता रॉय
भोपाल

शनिवार, 23 जनवरी 2016

जरसी में दरख़्त


आॅक्सफोर्ड से डिग्री लेने के बाद वह देश लौट आया था ।
मल्टीनेशनल कम्पनी के लाखों का पैकेज ठुकरा , जब फौज में जाने की बात की , तो ऐसा घमासान मचा घर में कि ... , लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग था ।
माँ को कई बार कहते सुना था कि उसके पिता बतौर एक वीर सिपाही , युद्ध में दुश्मनों को दर्द देते हुए , दाँत खट्टे कर , उस चोटी को अपने कब्जे में लेकर , वहाँ झंडा फहरा दिये थे लेकिन , इलाज करवाने के लिए एंबुलेंस में सैनिक अस्पताल की ओर वैन रवाना होने पर , अपने ही किसी गद्दार द्वारा गोली से भून दिये गये ।
युद्ध के उपरांत , युद्ध के हालातों के लिये जिम्मेदार दो प्रतिनिधि जब गले लग रहे थे , उसी वक्त परिवार ने फौज की नौकरी करने के मामले में , अगली पीढ़ी पर अंकुश जड़ दिये ।
लेकिन , उसे फौज आवाज देती थी । आज मौका मिला है देश पर कुर्बान होने का । बाॅर्डर पर फिर से हमला जारी था और देश को उसकी जरूरत ।
" तु फौज छोड़ दे बेटा "
" माँ , तुझे आज एक चीज़ देता हूँ , शायद तुम समझ सको । यह लो ..." जेब से कागज़ का टुकडा निकाल बढ़ा दिया ।
" क्या है यह ? "
" पढ़ कर देखो ।"
" यह तो तेरे पापा की लिखावट है ! "
मेरे बेटे ,
तुम मेरे हाथ की बोई हुई बीज हो , तुम एकदिन देश की सुरक्षा करने वाला सुदृढ़ दरख़्त बनोगे
--- ठाकुर रणवीर सिंह ।
"कहाँ से मिला तुम्हें यह , मैने तो ....! "
" हाँ , तुमने तो पापा की जरसी में छुपा कर रखी थी ना !
बचपन में , तुम से छुपकर उस जरसी को पहनते हुए एकदिन मुझे ....."
माँ दोनों हाथों में उसके हाथ रख सिसक पडी । सामने उसका पति रणवीर सिंह उसी जरसी में खडा़ मुस्कुरा रहा था ।
कान्ता राॅय
भोपाल