शनिवार, 14 मार्च 2015

धर्मांतरण क्यों ?(लघुकथा )


" मै नहीं करूँगी अपना धर्म परिवर्तन । तुमने तो कहा था कि मै जैसी हूँ तुम्हें अच्छी लगती हूँ । "

" लेकिन बिना धर्म परिवर्तन के हमारी शादी असंभव है । "

" यह मेरे नीति के खिलाफ है । मै धर्म परिवर्तन नहीं करूँगी चाहे कुछ भी हो । " --साजिया अडिग थी अपने बातों पर ।

दिवाकर  को स्तब्ध देख कर साजिया  जैसे ही वहाँ से जाने को हुई तो अचानक दिवाकर  मुस्कुरा उठा और साजिया  का हाथ अपने हाथ में लेकर  हल्के  से दबाते हुए  कहा --" चलो हम कोर्ट मैरिज करते है । "

कान्ता राॅय
भोपाल

फर्श का अर्श (लघुकथा )


" माँ , देखना एक दिन मै बहुत पैसा कमाऊँगा और बहुत बडा आदमी बनूँगा । " --- माँ को घरों में बर्तन माँजते हुए देख  विजेन्द्र का दिल रो पडता था ।

पैसे की तंगी से पढ़ाई बमुश्किल ही कर  पाया था ।  सरकारी दफ्तर में जब नौकरी लगी तो सिर्फ पैसा कमाना ही उद्देश्य समझा उसने ।
कुछ ही साल में विजेन्द्रपाल सिंह शहर के रईसों में गिना जाने लगा ।

" ओह ! ऐसा कैसे हो गया । "-- चुनाव परिणाम विपरीत साबित हुआ और उम्मीदें धरासायी हुई ।
चंद महीनों बाद ही अचानक विजेन्द्रपाल सिंह के दफ्तर , कारखाने और घर पर छापा पड़ रहा था ।
फर्श का अर्श फिर फर्श पर ही आ गिरा था ।

कान्ता राॅय
भोपाल

दोहरा चरित्र (लघुकथा )

मै सोई हूँ तो यह कौन मेरे अंदर का जाग रहा है ?  क्यों इसकी शक्ल मुझसे मिलती है ?

"तुम क्या कर रही हो यहाँ ?
तुम्हारा क्या काम है मुझसे ? "

यह  जबाव क्यों नहीं देती है   ?  मुझे देख कर सिर्फ मुस्कुरा रही  है ।
उफ्फ !! क्या यह  मेरी खिल्ली   उडा रही है  ।   इसे देख कर क्यों मुझे कोफ्त सी हो रही है ।

" क्या तुम मुझे डराने आई हो ?   मै क्यों डरूँ तुमसे यह बताओ जरा  ? "

" मै अंतरआत्मा हूँ तुम्हारी  इसलिए तुम्हारे मन का सब बातों को जानती हूँ ।  कुछ भी छिपा नहीं मुझसे । इसलिए तुम्हारी दोहरे चरित्र पर मुझे हँसी आ रही है । "

कान्ता राॅय
भोपाल

बहना की डोली (लघुकथा )


सीमा पार फिर से युद्ध विराम तोड़ दिया गया था  ।
भैया  ने मिग -२१ की उड़ान से  पहले  फोन पर वादा किया था कि तेरी  डोली को कंधा  देने तेरा भैया जरूर आयेगा ।
बिट्टो  डोली में चढनें से पहले दौड़ कर शेरावाली को मिन्नतें करने लगी ।

" हे मातारानी , तुझे  हाथ जोड़ विनती करती  हूँ । मेरे भैया को सदा सलामत रखना । "-- शादी के जोड़े में बिट्टो भैया की राह तकते हुए  मातारानी से दुआएं कर रही थी कि अचानक ढोल और शहनाई की आवाज बंद हो गई । बिट्टो दौड़ कर दरवाजे की ओर भागी और स्तब्ध रह गई ।

भैया तिरंगे में लिपटे हुए चार कंधो पर सवार हो बिट्टो की डोली को कंधा देने आ गये थे ।

कान्ता राॅय
भोपाल

सुई या ... ?



मै सदा सिलती रहती हूँ फटे पुराने चिथड़ों को तुम्हारे । कितनी बार तुम्हारे उधड़ती हुई कपड़ों को जोडती रही हूँ रिश्तों को बुनती रही हूँ ।

मै जब तुम्हारे  काम की नहीं होती ,  घर के किसी पुराने कागजों की तह में खोंस दी जाती हूँ ।

मुझे सदा सलीके से रखो , नही तो मेरी पैनी नोंक में चुभ जाओगे तुम ।

मै सुई सरीखी पत्नी ही हूँ तुम्हारी ।
मेरी जरूरत तुम्हें हर पल रिश्ते  बुनने के लिए पडेगी ।
मेरे ना होने से कल  कैसे तिलमिला उठे थे तुम ।

  जब मुझे अनदेखा करते रहते हो तब क्यों नहीं याद रहती है तुम्हें मेरी जरूरत  । क्या मै तुम्हारे लिए सुई से बढ़कर नहीं ?

कान्ता राॅय
भोपाल